चार संप्रदाय

अपने अनुभाष्य में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते है की भक्तिमयी सेवा जो की काल्पनिक ज्ञान पर आधारित हो शुद्ध भक्तिमयी सेवा नहीं कहलाती l जब भी कोई भौतिक विचार आता है तो वह नकारात्मक हो या सकारात्मक दोनों ही परिस्थितयो में पुर्णतः आध्यात्मिक नहीं होता lयद्यपि एसा ज्ञान भौतिक रूप से शुध्ह ना भी हो किन्तु उस ज्ञान में हमने अपने मनोधर्म को स्थान दिया है इसलिए इस प्रकार की भक्तिमयी सेवा पूर्ण रूप से कल्मष मुक्त नहीं कही जा सकती l इसलिए जो पूर्णतः अध्यात्मिक जीवन चाहते है उन्हें अपने मतानुसार कोई भी सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करना चाहिए l भौतिक अस्तित्व को नकारने का मतलब आध्यात्मिक अस्तित्व नहीं होता l भौतिक अस्तित्व को नकारने के बाद भी अध्यात्मिक अस्तित्व सत चित आनंद महसूस नहीं किया जा सकता l जब तक कोई भगवान से अपने सम्बन्ध को समझ नहीं लेता तब तक कोई भी पूर्ण अध्यात्मिक जीवन नहीं जी सकता l अध्यात्मिक जीवन का वास्तविक अर्थ है भौतिक विषयों के प्रति उदासीन होना और अध्यात्मिक विषयों के प्रति असक्त होना l जो कृष्ण के चरणों में पूर्णतः समर्पित है वाही पूर्ण रूप से भक्तिमय बन सकता है l इस बात की पुष्टि श्रीमद भ्ग्वातम १०.१४.३. में की गई है l

गर्ग संहिता 10:61:23-26 में लिखा गया है “वामन देव , ब्रम्हाजी , अनंत शेष और सनत कुमार भगवान विष्णु के आदेशानुसार ब्राम्हणों के रूप में अवतरित होंगे और कलियुग में धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे l कलियुग में विष्णुस्वामी, माधवाचार्य , रामानुज और निम्बार्काचार्य ,इस चारो संतो ने जो की क्रमश: वामन देव , ब्रम्हाजी , अनन्त शेष और सनत कुमार के अंशावतार मने जाते है और इन्होने चार सम्प्रदायों की स्थापना की l इन चारो ही सम्प्रदायों में गुरु शिष्य परंपरा के आधार पर ज्ञान को स्तानान्तरित किया है और हर काल में धर्म के सिधान्तो का प्रचार किया गया है l इन सम्प्रदायों में कुछ भक्त राधा-कृष्ण की और कुछ अन्य सीता–राम, लक्ष्मी- विष्णु की व् रुक्मिणी-कृष्ण की उपासना करते है l ये चारो ही संप्रदाय भगवान कृष्ण को परब्रम्ह स्वीकार करते है और देवी देवताओ की उपासना का खंडन करते है l ये सभी वैष्णव संप्रदाय है l जो केवल कृष्ण और उसके विभिन्न अवतारों की उपासना करते है वैष्णव कहलाते है l जो पंचोपसना करते है वे स्मार्त ब्राम्हण कहलाते है l

एक वैष्णव को वेदांत सूत्र का अध्ययन करना चाहिए जो की इन चार सम्प्रदायों द्वारा लिखे गए है l अपने मनोधर्म के अनुसार भक्ति नहीं करना चाहिए lइस सम्प्रदायों के भाष्यों का निचोड़ यह है की परम सत्ता कृष्ण है और वे हम सबके परम स्वामी है तथा जीव भगवान का सनातन दास हैl (चैतन्य चरितामृत, अन्त्य लीला 2.95 )

Iskcon ब्रम्ह् संप्रदाय के अंतर्गत आता है जिसमे ज्ञान का प्रसार ब्रम्हाजी से नारद जी को उनसे माधवाचार्य और उनसे चैतन्य महाप्रभु को प्राप्त हुआ चैतन्य महाप्रभु में गौडीय वैष्णव गुरु शिष्य परंपरा के अधर पर आगे गुर श्रील भक्तिविनोद ठाकुर हुए तत्पश्चात गौर किशोर बाबाजी और फिर श्रील भक्ति सिद्धांत ठाकुर हुय्रे जिनके शिष्य परम वैष्णव आचार्य जगद गुरु श्रील प्रभुपाद ने Iskcon की स्थापना थी l

लोगो को लगता है की Iskcon कुछ कनवर्टेड अमेरिकी शिष्यों का संगठन है जो कृष्ण भावनामृत का प्रचार कर रहे है किन्तु एसा नही है l Iskcon की स्थापना हुए ५० वर्ष से अधिक वर्ष हो गए और दुनिया भर में कई Iskcon मंदिर है l यह पारम्पर अज कल की नहीं है यह ब्रम्ह्संप्रदय की श्रेणी में है और इसकी शिक्षाए शास्त्रों में वर्णित प्राचीन सनातन धर्म पर आधारित है l

गुरु कृष्ण से भी अधिक दयालु और करुणावान होते है l जैसे अगर कोई यूनिवर्सिटी है तो वहां किसी छात्र को उत्तीर्ण होने के लिए उसे परीक्षा देनी पड़ती है l ऐसे ही भगवद प्राप्ति के लिए भी आपको मृत्यु रूपी परीक्षा के बाद कृष्ण प्राप्ति के लिए जीवन भर तैयारी करनी पड़ती है l और यदि आपके सर पर गुरु का हाथ है तो यह काम और भी आसान हो जाता है l

जैसे कोई छात्र fail होता है या paas इससे यूनिवर्सिटी को खास फर्क नहीं पड़ता पर अगर उस छात्र ने यदि किसी teacher की सहायता से अध्धयन किया है तो teacher जरूर चाहता है की उसका छात्र paas हो जाये l ऐसे ही हमलोग भगवान् के बच्चे है अगर हम भगवद प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं करते तब भी भगवान ज्यादा mind नहीं करते किन्तु यदि हमारे पास गुरु है तो वह जरूर चाहत है की उसके आज्ञाकारी शिष्य उत्तीर्ण हो जाये l इसलिए आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु अति आवश्यक है l सभी सम्प्रदायों में गुरु की महत्ता को स्वीकार किया गया है l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ……………………………. हरे कृष्णा

पहले कौन — भगवान कृष्ण या भगवान विश्नु

भगवान कृष्ण ही विष्णु के रूप में अवतरित होते है या भगवान विष्णु , कृष्ण रूप में अवतरित होते है ?

पृथ्वी पर सात द्वीप है , इसलिए पृथ्वी सप्तदीपा कहलाती है l यही भूलोक है l भू लोक से भुव: ,स्वः ,मह:, जनः , तपः और सत्यम — ये छह लोक ऊपर है और तल , अतल , वितल, सुतल ,तलातल ,पातल और रसातल ––ये सात लोक नीचे है l तो भू लोक के ऊपर छः लोक और भू लोक के नीचे सात लोक; इस प्रकार कुल मिलाकर १४ लोको के इस साम्राज्य के अधिपति ब्रम्हा जी है l यह चौदह लोको वाला ब्रम्ह्जी का अंड है इसलिए इसे ब्रम्हांड कहते हैl इस ब्रम्हांड के स्वामी सदा एक ही ब्रम्हा जी नही होते l वर्त्तमान ब्रम्हाजी के जीवन के जब १०० दिव्य वर्ष समाप्त हो जाते है तब दुसरे नए ब्रम्हाजी नियुक्त होते है l

दिव्य वर्ष क्या होता है ?

श्रीमद भागवतम में वर्णन मिलता है की जिसे हम पृथ्वी पर एक वर्ष कहते है वह देवताओ का एक दिन होता है l देवताओ के ऐसे ३६० दिनों का एक दिव्य वर्ष होता है l इसप्रकार के ४००० दिव्य वर्षी का सतयुग , ३००० दिव्य वर्षो का त्रेता युग , २००० दिव्य वर्षो का द्वापर युग और १००० दिव्य वर्षो का कलयुग होता है l एक युग बीत जाने के बाद तुरंत ही दूसरा युग शुरू नही होता बीच में संधि और संध्यांश काल भी होते है जो की युग काल के दुगुने होते है इस प्रकार सतयुग का ८००० दिव्य वर्सो का , त्रेता युग का ६००० दिव्य वर्षो का , द्वापर युग का ४००० दिव्य वर्षो का और कल युग का २००० दिव वर्षो का संधि संध्यांश काल होता है l इन चार युगों को एक चौकड़ी कहते है l

जब ऐसी ७१ चौकड़िया बीत जाती है तब एक मन्वंतर होता है l एक मन्वंतर के समाप्त होने के बाद पुराने इंद्र, मनु , प्रजापति , सप्तर्षि आदि बदल जाते है और फिर उनके स्थान पर नए नियुक्त किये जाते है l जब ऐसे १४ मन्वंतर बीत जाते है मतलब १४ इंद्र आदि देवता बदल जाते है तब ब्रम्हाजी का एक दिन होता है l

ब्रम्ह्जी के एक दिन को एक कल्प कहते है l तो दिन के समय ब्रम्हाजी सृजन करते है और फिर रात्रि में सबकुछ समेटकर सो जाते है l जैसे ही उनका अगला दिन (कल्प) शुरू होता है वे फिर से काम पर लग जाते है l इस प्रकार ब्रम्हाजी रोज व्यापार करते रहते है l

ब्रम्ह्जी के ३६० दिनों(कल्पो) का एक ब्रम्ह वर्ष होता है और ऐसे वर्षो से ब्रम्ह्जी की आयु १०० ब्रम्ह वर्ष की होती है l कल्प में तो केवल तीन ही लोको का नाश होता है किन्तु ब्रम्हाजी की आयु समाप्त होने पर १४ भुवन वाले समूर्ण ब्रम्हांड का ही नाश हो जाता है इसे महाप्रलय कहते है l

महाप्रलय के समय ब्रम्हा जी मुक्त पुरुषो के साथ परम भगवान महाविष्णु की श्वास से उनके शरीर के बीतर चले जाते है और जब महाविष्णु पुनः श्वास छोड़ते है तो पुन: प्रकट होकर सृजन करते है l इस प्रकार यह सृष्टि चक्र चलता रहता है l

यह हो हुआ एक ब्रम्हांड का हाल और ऐसे अनंत ब्रम्हांड महाविष्णु के एक बार श्वास छोड़ने से प्रकट होते और जब श्वास अन्दर खीचते है तो नष्ट हो जाते है l इस सारी प्रक्रिया में केवल एक स्थान है जो जैसे का तैसा अनश्वर और सनातन बना रहता है वह है भगवान कृष्ण का निज धाम गोलोक वृन्दावन l

श्रीमद भागवतम में कहाँ गया है की भगवान महाविष्णु और कृष्ण एक ही है l जैसे की मै अपने घर पर एक माँ हु, पत्नी हु किन्तु जब मै अपने कॉलेज में इंजीनियरिंग के बच्चो को पढ़ाती हु तब मै एक प्रोफ़ेसर कहलाती हु l ऐसे ही भगवान अपने निज धाम गोलोक वृन्दावन में गोपियों के प्रियतम ,यशोदा माई के लाला और नन्द नंदन — कृष्ण है पर सृष्टि के लिए जब वे कlरण सागर में योग निंद्रा में शयन करते है तो वे महाविष्णु कह्ललाते है l

कृष्ण सभी अवतारों के श्रोत है और उनका धाम नित्य और शाश्वत है l सत युग में वे ही विष्णु रूप में लीला करते है , त्रेता में वे ही प्रभु राम बनकर आते है और जब द्वापर युग आता है तब वे भूलोक पर अपने original कृष्ण रूप में अवतरित होकर धर्म की पुन: स्थापना करते है l

जब भगवान अवतार लेते है तब वे अपने शाश्वत धाम में भी वैसे के वैसे ही बने रहते है l एसा नही है की अब अगर भगवान भूलोक पर आ गए है तो वे गोलोक वृन्दावन में अनुपस्थित होंगे l भगवान की शक्ति अचिन्त्य है इसलिए हमें अत्यधिक तर्क पूर्ण व्याख्या से बचना चाहिए और भगवान कृष्ण को परम सत्ता स्वीकार करना चाहिए l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ………………… हरे कृष्ण l

चतुश्लोकी भागवत

भगवान परम सत्य है l परम सत्य का अर्थ है जो कभी भी नष्ट नहीं होता, जो परमानेंट है l श्रीमद भागवतम में ४ श्लोक दिए गए है जिन्हें चतुश्लोकी भागवतम कहते है जिनमे सम्पूर्ण ज्ञान का रहस्य वर्णित है l

देवर्षि नारद अपने पिता सृजनकर्ता ब्रम्हाजी से प्रश्न करते है – हे ब्रह् देव ! अlपने इस पूरी सृष्टि का सृजन किया है पर आप अनासक्त बने रहते है l तो अपने यह कैसे किया ?

ब्रम्हाजी बोले – हे नारद ! जब स्वयं भगवान महाविष्णु ने मुझे सृष्टि करने की आज्ञा दी तब यही प्रश्न मैंने भी उनसे किया था l तब उन्होंने मुझे ४ श्लोको द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान दिया था l इन श्लोको को चतुश्लोकी भगवत कहते है l इस श्लोको के ज्ञान ने मुझे बिना अlसक्त हुए सृष्टि करने में सहायता की l इन श्लोको में परम भगवान महाविष्णु(कृष्ण) द्वारा कहा गया ज्ञान है l

पहले श्लोक में कृष्ण कहते है की कही भी मेरे से पहले कुछ भी नही था और मेरे बाद भी कुछ शेष नहीं बचता l और इस प्रकार उन्होंने घोषणा की उनके बगैर कही भी कुछ भी संभव ही नहीं है l यह वेदों में कहे गए प्रथम महावाक्य के जैसे है जिसमे की वर्णन है की सर्वत्र परमात्मा का वास है l

तो इसे बढ़ने के बाद एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है की यदि महाविष्णु(कृष्ण) परम सत्य है तो यह जिसे हम प्रकृति कहते है सृष्टि कहते है वह क्या है ?

तो इसके उत्तर में भगवान कहते है मेरे आलावा जो कुछ भी तुम्हे विद्यमान प्रतीति होता है वह मेरी ही शक्ति माया द्वारा रचा गया मोह है l जैसे की अँधेरे में रस्सी को सांप समझने का भ्रम होता है वैसे ही जो कुछ भी मेरे आलावा या मुझसे अलग प्रतीत होता है वह सब कुछ और नहीं बल्कि स्वयं मै हु l जब हम नींद में होते है तो हम स्वप्न देखते है ; स्वप्न में कई तरह के लोग , चीज़े और स्थान देखते है जो की हमें बिलकुल real लगती है किन्तु जब हम नींद से जागते है तो सब कुछ ख़तम हो जाता है इसीलिए हम इसे real नहीं है कहते हैl जैसे हम स्वप्न देखते है वैसे ही विष्णुमाया मोह रूपी संसार का निर्माण करती है जिसे की प्रकृति/सृष्टि कहते है l

तीसरा शोल्क बहुत ही गूढ़ है l इसमें कृष्ण कहते है की मै इस दुनिया में सर्वत्र हु किन्तु तो भी मै उनमे नहीं हु l यह पढने में बहुत विरोधाभासी प्रतित होता है- कोई कैसे सब कुछ है तो भी सबमे नहीं है l जैसे अँधेरे में रस्सी है जो की सांप जैसी दिख रही है इस प्रकार रस्सी की वजह से सांप होने का भ्रम हो रहा है अर्थात रस्सी की वजह से साँप है एसा दिख रहा है किन्तु सचमुच में कोई साँप नहीं है इसलिए रस्सी के सांप होने का कोई प्रश्न की नहीं होता l

अंतिम ४था श्लोक हमें परम सत्य की अनुभुती करlता है l परम सत्य को जानने के लिए पहले हमें यह जाना होगा की क्या परम सत्य नहीं है l चूँकि परम सत्य हमारी इन्द्रिय समझ के परे है है इस लिए उन्हें समझने के लिए वो क्या क्या नही है समझना ज्यादा आसान है इसलिए इस प्रकार वर्णन किया गया है l इसलिए वेदों में परम सत्य का वर्णन नेति नेति (परम सत्य यह नहीं है , परम सत्य वह नहीं है ….) कहकर किया गया है l जब आप जान जाते है की रस्सी सांप नहीं है l इसलिए जब हम यह समझ जाते है की रस्सी सांप नहीं है तब हम आसानी से कह सकते है की यह रस्सी है l इसी प्रकार परम सत्य भौतिक प्रकृति नहीं है अर्थात भौतिक प्रकृति तो है ही नहीं जो कुछ भी है परम सत्य(भगवान) ही है l वासुदेवः सर्वम इति l

हे नारद इस प्रकार जब इन चार श्लोको को जब मैंने श्री भगवान कृष्ण के मुख से सूना तो मेरा कर्तुत्व का भाव मिट गया और मुझे पूर्ण ज्ञान की अनुभूति हुई इस प्रकार मैंने खुद को सृजन के कार्य में अनासक्त होकर लगाया और अपनी duty निभाई l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………….. हरे कृष्ण l

कृष्ण सर्वत्र साक्षी है

एक बार की बात है उद्धव भगवान कृष्ण से पूछते है – हे कृष्ण मै आपको समझ पाने में असमर्थ हु इसलिए आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हु ?

कृष्ण ने कहाँ संकोच न करो मित्र पूछो जब अनुमति मिल गई तो उद्धव बोले- हे कृष्ण !मुझे बताइए की सच्चा मित्र कौन है ?

कृष्ण बोले – सच्चा मित्र वह है जो न बुलाये जाने पर भी अपने मित्र की सहायता के लिए खुद आता है l

उद्धव – कृष्ण तुम पांडवो के सच्चे मित्र हो पर जब उन पर विपत्ति आई तब तो तुमने उनकी सहायता नहीं की l तुमने उन्हें जुआ खेलने से रोका क्यों नहीं ? चलो नहीं रोका तो नहीं रोका पर तुम चाहते तो भाग्य को उनके अनुकूल कर सकते थे ताकि उनकी विजय हो l किन्तु तुमने एसा भी नही किया l क्यों? और तब जब दुर्योधन ने कहाँ की वह जुए में हारी हर चीज़ लौटा देगा यदि वह द्रौपदी को दाव पर लगाकर दाव जीत जाता है; तब भी तुमे धर्मराज को और आगे खेलने से नहीं रोका क्यों ? उसके बाद द्रौपदी को भरी सभा में बाल पकड़कर घसीटा गया पर तुममें कुछ नहीं किया क्या वे तुम्हारे मित्र नहीं थे ? जब अपमानित द्रौपदी लगभग नग्न होने ही वाली थी तब तुमने उसे वस्त्र दिए तो क्या यह उसकी लाज बचाना था?

केवल तुम जब लोगो की विपत्ति में रक्षा करोगे तो ही “आपधबान्ध्व “ कहला सकते हो किन्तु तुमने तो उनकी मदद नहीं की तो तुम्हे क्यों इस नाम से पुकार जाना चाहिए ? हे केशव क्या यह धर्म है ? और इस प्रकार पूछते हुए उद्धव के नेत्रों से अश्रु धरा बहने लगी l

भगवान कृष्ण बोले – हे उद्धव ! इस दुनिया का नियम है—“ जो विवेक शील है व्ही विजयी होता है “
शुरू में जुए के खेल में धर्मराज जीत रहे थे क्यों की दुर्योधन दाव खेलना नहीं जनता था इस लिए उसेने अपना विवेक इस्तेमाल किया और अपने मामा शकुनी को खेल में शामिल करवाया l शकुनी जुआ खेलना जनता था इसलिए अब दुर्योधन जीत रहा था l धर्मराज को भी ऐसे ही मुझे खेल में शामिल करवाना था पर उसने एसा नहीं किया क्यों की पांडव मुझसे छुपकर खेल खेलना चाहते थे l उन्होंने मुझे शामिल नहीं किया l तुन्हें क्या लगता है की यदि मै धर्मराज की तरफ से खेलता तो कौन जीतता ? यदि मै धर्मराज की इस भूल को भूल भी जाऊ तो उसने एक और मुर्खता यह की कि मुझसे प्रार्थना की – “ हे कृष्ण ! तुम अन्दर मत आना “ इसप्रकार उसने अपने दुर्भाग्य को स्वयं न्योता दिया l उसने मुझे अपनी प्रार्थना द्वारा बाँध रखा था ; मै तो वही बहार प्रतीक्षा कर रहा था की कोई तो मुझे याद करेगा पर किसी ने मुझे याद नही किया l द्रौपदी ने भी पहले मुझे याद नहीं किया वह अपने बल पर अपनी रक्षा करती रही , परिजनों को रक्षा के लिए बुलाती रही और जब कोई नहीं आया तब उसे मेरी याद आई तब जाकर मैंने उसकी रक्षा की l तुम ही बताओ इस सब में मेरी क्या गलती है ?

उद्धव बोले – वाह ! बढ़िया तर्क है कान्हा मै तो impress हो गया पर मै अभी निःशब्द नहीं हुआ हु ; क्या मै एक और प्रश्न पूछ सकता हु ? कृष्ण ने अनुमति दे दी l

तब उद्धव बोले – तो इसका मतलब है की तुम केवल तब आओगे जब तुम्हे बुलाया जायेगा ? क्या तुम खुद अपने आप धर्म की रक्षा के लिए नहीं आओगे ?

कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले – हे उद्धव ! हर किसी का जीवन उनके कर्मो के आधार पर निर्धारित होता हैl मै इस कर्म के सिद्धांत को न तो लागु करता हु न ही इसमें कोई हस्तक्षेप ही करता हु l मै तुन्हारे अन्दर साक्षी की तरह सदैव विद्यमान रहता और जो कुछ भी तुम करते हो सब कुछ देखता रहता हु l परमात्मा रूप में यही मेरा धर्म है l

बहुत अच्छे तो तुम हमेशा हमरे पास ही हो और सब कुछ नोट करते रहते हो , हमारे सरे कुकर्मो को देखते रहते हो और इस तरह हमें न रोक कर तुम यह चाहते हो की हम और भी पाप करते रहे और जन्म – जन्मान्तर तक भुगतते रहे ? उद्धव बोले l

कृष्ण बोले – हे उद्धव ! तुम मेरे वाक्यों को गहराई से समझने की कोशिश करो l यदि तुम यह समझ जाओ की मै सदैव तुम्हारे भीतर हु तो फिर तुम कोई भी बुरा काम कर ही कैसे सकते हो ? किन्तु जब तुम इन्द्रिय सुख में डूबकर मुझे भूल जाते हो और फिर अधिकाधिक सुख पाने की आस में मुझे पूरी तरह भूल जाते हो तब एक के बाद एक पाप कर्म करते रहते हो l इस प्रकार मै तुम्हे कभी नहीं छोड़ता पर तुम मुझे छोड़कर कर पाप में लग जाते हो और कर्म के सिद्धांत के अनुसार दण्डित किये जाते हो l यह धर्मराज की भूल थी की वे यह सोच रहे थे की वे मेरी जानकारी के बिना भी जुआ खेल सकते है l यदि वे यह अनुभव कर लेते की मै सदा सर्वत्र साक्षी रूप से विद्यमान हु तो क्या जुए का खेल कुछ अलग ही तरह से समाप्त न हुआ होता ?

उद्दव बिलकुल चुप हो गए और भक्तिभाव से बोले – “ हे केशव ! कितनी गहन बात कही है तुमने ! वस्तुतः यही परम सत्य है l “

यदि हम यह समझ जाए की कुछ भी कृष्ण के बगैर हिल तक नही सकता तो फिर हम कैसे उन्हें साक्षी रूप में हर जगह नहीं पाएंगे ? और तब उन्हें भूलकर कुछ भी पाप कर्म कर ही कैसे सकते है ? सारे पापाचार और उनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओ का मूल है “कृष्ण से विमुखता“l

पूरी भगवद गीता में कृष्ण ने यही बात अर्जुन को जगह-जगह समझाने की कोशिश की है l वे अर्जुन के सारथि और सलाहकार थे पर फिर भी अर्जुन के युध्ह में खुद नही लड़ाई नहीं की , तो हुए ना साक्षी l हमें यह महसूस करना चाहिए की हम कभी भी अकेले नहीं है और कृष्ण से बचकर कुछ भी नही कर सकते l कृष्ण साक्षी रूप में हमारा इंतज़ार कर रहे है कब हम उन्हें अपनी हर क्रिया में शामिल मानते हुए अपनी चेतना को “कृष्ण चेतना” में परिवर्तित करके सदैव उनका ध्यान कर पायेंगे l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………………………. हरे कृष्णा

सत्संग से लाभ

एक डाकुओ का दल था उनमे जो बड़ा डाकू था , वह अपने संगी डाकुओ से कहता था – “ भाई जहाँ कथा सत्संग होता हो , वहां कभी मत जाना , नहीं तो तुम्हारा सब काम बंद हो जायेगा l कंही जा रहे हो और बीच में यदि कथा सत्संग हो तो जोर से कान बंद कर लेना , उसको सुनना बिलकुल नहीं l “

इस प्रकार की शिक्षा डाकुओ को मिली थी l एक दिन एक डाकू कहीं जा रहा था मार्ग में एक जगह सत्संग प्रवचन हो रहा था l जब डाकू उधर से गुजरने लगा तो उसने अपने कान जोर से बंद कर लिए और चलने लगा l चलते हुए अचानक उसके पैरो में एक काँटा चुभ गया l उसने एक हाथ से काँटा निकlला और फिर कान दबाकर चल पड़ा l काँटा निकlलते समय उसको यह बात सुनाई दी की “देवताओ की परछाई नहीं दिखती “

कुछ दिनों बाद उन डाकुओ ने राजा के खजाने में डंका डाला l राजा के गुप्तचरों ने खोज की l एक गुप्तचर को उन डाकुओ पर शक हो गया l डाकू लोग देवी की पूजा करते थे l तो वह गुप्तचर देवी का रूप बनाकर उनके मदिर में देवी प्रतिमा के पास खड़ा हो गया l जब डाकू लोग वहां आये तो उसने कुपित होकर डाकुओ से कहाँ-“ तुम लोगो ने इतना धन खा लिया , पर मेरी पूजा ही नही की ! मै तुम सबको ख़त्म कर दूंगी l” एसा सुनकर वे सब डाकू डर गए और बोले की क्षमा करो हमसे भूल हो गई l हम जरुर पूजा करेंगे l अब वे धुप दीप जलाकर देवी की आरती करने लगे l

उनमे से जिस डाकू ने कथा की यह बात सुन राखी थी की देवता की परछाई नहीं होती तो , वह बोला यह देवी नही है l देवी की छाया नहीं पड़ती पर इसकी तो पड रही है l एसा सुनते ही डाकुओ ने देवी का रूप बनाये हुए उस गुप्तचर को पकड़ लिया और लगे मारने l तो वह गुप्तचर वहां से भाग गया l जब सत्संग की एक आधी-अधूरी बात सुनकर भी उस डाकू को लाभ हुआ तो क्या जो नित्य सत्संग कर रहे उन्हें लाभ नहीं होगा ?

यद्यपि इस कहानी से डाकू को भौतिक लाभ हुआ जो की कोई ऊँची बात नहीं है किन्तु भक्तो सत्संग, भक्ति , प्रसाद , भगवत नाम आदि से होने वाले लाभ स्वयं हमारी ग्रहण क्षमता पर निर्भर करते है l जैसे एक ही ग्रन्थ भगवद गीता का श्रवण करने वाले अलग अलग श्रोताओ पर उसका अलग अलग असर होता है वैसे ही हमारे भाव के अनुसार ही हम सभी बातो को ग्रहण करते है और लाभान्वित होते है l

तो दो मुख्य बाते है – सत्संग से लाभ निश्चित है और लाभ निर्भर करता है हमारी स्वयं की मनोदशा पर l तो पुरे मनोयोग से सत्संग करिए और मन चाहा परिणाम पाइए l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………………… हरे कृष्ण l

शोक क्यों करे ?

 
भगवद गीता में परब्रम्ह श्री कृष्ण ने अर्जुन का शोक समाप्त करने के लिए उसे शरीर और आत्मा के विषय में बताया की आत्मा अविनाशी है इसे जलाया , सुखाया या हथियारों के द्वारा काँटा नहीं जा सकता l अतः आत्मा का नाश संभव नहीं है l आत्मा न तो उत्पन्न होती है न ही नष्ट होती है इसीप्रकार की परिभाषा अlपने physics में उर्जा की पढ़ी होगी “उर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है न नष्ट की जा सकती है वह केवल एक रूप से दुरसे रूप में रूपांतरित की जा सकती l” तो आत्मा अविनाशी है l
 
भगवान् से यह सब सुनकर भी जब अर्जुन चुप ही रहे तो भगवान ने अर्जुन से कहाँ – “ हे महाबाहो ! अगर तुम इस आत्मा को नित्य पैदा होने वाला और नित्य मरने वाला भी मान लो (हालाँकि की एसा है नहीं तो भी मान लो ) तो भी तुम्हे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए l”
 
भगवान् एसा इसलिए कह रहे है क्यों की जो जन्मने वाला है उसका मरण भी निश्चित है और जो मर गया है वह पुनः जन्म भी अवश्य लेगा – यह नियम कोई टाल नहीं सकता l अगर बीज को पृथ्वी में बो दिया जाये , तो वह फूलकर अंकुरित हो जाता है और फिर वह क्रमश: बढ़ता हुआ वृक्ष बन जाता है l तो इस प्रकार वह एक क्षण के लिए भी एक जैसा (या वैसे का वैसा) नहीं रहता निरंतर अपना रूप बदलता रहता है l दुनिया की कोई भी चीज़ जो आप इस क्षण देख रहे है अगले क्षण में वैसी की वैसी नहीं रहेगी उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन समय के साथ अवश्य होगा चाहे आप नोट कर पाए या न कर पाए ; हर पल हर चीज़ अपना रूप बदल रही है l समय में एक क्षण के लिए भी पीछे जाकर हम उस चीज़ को वैसा नहीं देख सकते जैसी वह पहले थी l
 
वस्तुतः जिसे हम रूप बदलना कह रहे है यह तभी संभव है जब कोई वास्तु अपने पुराने रूप को समाप्त करके नए रूप को धारण करे मतलब प्रत्येक जीव अपने एक ही जीवन काल में भी प्रतिदिन बार बार जन्म ले रहा है और बार बार मर रहा है l जिंदगी के जितने साल हमने जी लिए उतने साल जिंदगी के कम हो गए तो यह प्रतिदिन जन्मना और मरना ही तो है l वैज्ञानिक कह्ते है की हमारे शरीर में रक्त और कोशिकाओ का समूह बार बार मरता है और फिर नया पैदा होता है ऐसा हर दिन हो रहा है l इस प्रकार देखा जाये तो हम प्रतिक्षण मर रहे है पर हम शोक नहीं करते क्यों ? क्यों की हम जानते है की हम यह सब रोक नहीं सकते l
 
संसार और शरीर नित्य परिवर्तनशील है यदि परिवर्तन न हो तो मनुष्य बालक से जवान कैसे बनेगा ? रोगी निरोग कैसे होगा ? बीज का वृक्ष कैसे बनेगा ? परिवर्तन के बिना संसार एक स्थिर चित्र बनकर रह जायेगा l वास्तव में मरने वाला ही मरता है तो शोक क्यों करे ? (शरीर मरने वाला है मरेगा ही)
 
रामायण में बलि के मरने के बाद जब तारा शोक करती है जो कुछ प्रभु श्री राम तारा से कहते है उसका सार इस प्रकार है – “तारा का शोक देख कर रघुराय ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया ले ली l प्रभु बोले क्षिति , जल , पावक , गगन , समीरा पांच तत्वों से यह अधम शरीर बना है l जो की बस कुछ काल के लिए प्रकट होता है फिर मर जाता है किन्तु आत्मा नित्य है l तुम क्यों रोती हो ? जब तारा में ज्ञान उपजा तो वह प्रभु के चरणों पर गिर पड़ी और प्रभु चरणों की परम भक्ति मिले एसी विनती की l”
 
तो हमें भी तारा से जीवन के वास्तविक लक्ष्य के बारे में शिक्षा लेनी चाहिए l अपने परिजनों की मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए और जीवित शरीर को श्री भगवान् के चरणों की सेवा में लगाना चाहिए l
 
जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद जय ………………………………. हरे कृष्णा l