चार संप्रदाय

अपने अनुभाष्य में श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर कहते है की भक्तिमयी सेवा जो की काल्पनिक ज्ञान पर आधारित हो शुद्ध भक्तिमयी सेवा नहीं कहलाती l जब भी कोई भौतिक विचार आता है तो वह नकारात्मक हो या सकारात्मक दोनों ही परिस्थितयो में पुर्णतः आध्यात्मिक नहीं होता lयद्यपि एसा ज्ञान भौतिक रूप से शुध्ह ना भी हो किन्तु उस ज्ञान में हमने अपने मनोधर्म को स्थान दिया है इसलिए इस प्रकार की भक्तिमयी सेवा पूर्ण रूप से कल्मष मुक्त नहीं कही जा सकती l इसलिए जो पूर्णतः अध्यात्मिक जीवन चाहते है उन्हें अपने मतानुसार कोई भी सिद्धांत प्रतिपादित नहीं करना चाहिए l भौतिक अस्तित्व को नकारने का मतलब आध्यात्मिक अस्तित्व नहीं होता l भौतिक अस्तित्व को नकारने के बाद भी अध्यात्मिक अस्तित्व सत चित आनंद महसूस नहीं किया जा सकता l जब तक कोई भगवान से अपने सम्बन्ध को समझ नहीं लेता तब तक कोई भी पूर्ण अध्यात्मिक जीवन नहीं जी सकता l अध्यात्मिक जीवन का वास्तविक अर्थ है भौतिक विषयों के प्रति उदासीन होना और अध्यात्मिक विषयों के प्रति असक्त होना l जो कृष्ण के चरणों में पूर्णतः समर्पित है वाही पूर्ण रूप से भक्तिमय बन सकता है l इस बात की पुष्टि श्रीमद भ्ग्वातम १०.१४.३. में की गई है l

गर्ग संहिता 10:61:23-26 में लिखा गया है “वामन देव , ब्रम्हाजी , अनंत शेष और सनत कुमार भगवान विष्णु के आदेशानुसार ब्राम्हणों के रूप में अवतरित होंगे और कलियुग में धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे l कलियुग में विष्णुस्वामी, माधवाचार्य , रामानुज और निम्बार्काचार्य ,इस चारो संतो ने जो की क्रमश: वामन देव , ब्रम्हाजी , अनन्त शेष और सनत कुमार के अंशावतार मने जाते है और इन्होने चार सम्प्रदायों की स्थापना की l इन चारो ही सम्प्रदायों में गुरु शिष्य परंपरा के आधार पर ज्ञान को स्तानान्तरित किया है और हर काल में धर्म के सिधान्तो का प्रचार किया गया है l इन सम्प्रदायों में कुछ भक्त राधा-कृष्ण की और कुछ अन्य सीता–राम, लक्ष्मी- विष्णु की व् रुक्मिणी-कृष्ण की उपासना करते है l ये चारो ही संप्रदाय भगवान कृष्ण को परब्रम्ह स्वीकार करते है और देवी देवताओ की उपासना का खंडन करते है l ये सभी वैष्णव संप्रदाय है l जो केवल कृष्ण और उसके विभिन्न अवतारों की उपासना करते है वैष्णव कहलाते है l जो पंचोपसना करते है वे स्मार्त ब्राम्हण कहलाते है l

एक वैष्णव को वेदांत सूत्र का अध्ययन करना चाहिए जो की इन चार सम्प्रदायों द्वारा लिखे गए है l अपने मनोधर्म के अनुसार भक्ति नहीं करना चाहिए lइस सम्प्रदायों के भाष्यों का निचोड़ यह है की परम सत्ता कृष्ण है और वे हम सबके परम स्वामी है तथा जीव भगवान का सनातन दास हैl (चैतन्य चरितामृत, अन्त्य लीला 2.95 )

Iskcon ब्रम्ह् संप्रदाय के अंतर्गत आता है जिसमे ज्ञान का प्रसार ब्रम्हाजी से नारद जी को उनसे माधवाचार्य और उनसे चैतन्य महाप्रभु को प्राप्त हुआ चैतन्य महाप्रभु में गौडीय वैष्णव गुरु शिष्य परंपरा के अधर पर आगे गुर श्रील भक्तिविनोद ठाकुर हुए तत्पश्चात गौर किशोर बाबाजी और फिर श्रील भक्ति सिद्धांत ठाकुर हुय्रे जिनके शिष्य परम वैष्णव आचार्य जगद गुरु श्रील प्रभुपाद ने Iskcon की स्थापना थी l

लोगो को लगता है की Iskcon कुछ कनवर्टेड अमेरिकी शिष्यों का संगठन है जो कृष्ण भावनामृत का प्रचार कर रहे है किन्तु एसा नही है l Iskcon की स्थापना हुए ५० वर्ष से अधिक वर्ष हो गए और दुनिया भर में कई Iskcon मंदिर है l यह पारम्पर अज कल की नहीं है यह ब्रम्ह्संप्रदय की श्रेणी में है और इसकी शिक्षाए शास्त्रों में वर्णित प्राचीन सनातन धर्म पर आधारित है l

गुरु कृष्ण से भी अधिक दयालु और करुणावान होते है l जैसे अगर कोई यूनिवर्सिटी है तो वहां किसी छात्र को उत्तीर्ण होने के लिए उसे परीक्षा देनी पड़ती है l ऐसे ही भगवद प्राप्ति के लिए भी आपको मृत्यु रूपी परीक्षा के बाद कृष्ण प्राप्ति के लिए जीवन भर तैयारी करनी पड़ती है l और यदि आपके सर पर गुरु का हाथ है तो यह काम और भी आसान हो जाता है l

जैसे कोई छात्र fail होता है या paas इससे यूनिवर्सिटी को खास फर्क नहीं पड़ता पर अगर उस छात्र ने यदि किसी teacher की सहायता से अध्धयन किया है तो teacher जरूर चाहता है की उसका छात्र paas हो जाये l ऐसे ही हमलोग भगवान् के बच्चे है अगर हम भगवद प्राप्ति के लिए प्रयास नहीं करते तब भी भगवान ज्यादा mind नहीं करते किन्तु यदि हमारे पास गुरु है तो वह जरूर चाहत है की उसके आज्ञाकारी शिष्य उत्तीर्ण हो जाये l इसलिए आध्यात्मिक उन्नति के लिए गुरु अति आवश्यक है l सभी सम्प्रदायों में गुरु की महत्ता को स्वीकार किया गया है l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ……………………………. हरे कृष्णा

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