रथयात्रा ( गुंडीचा यात्रा ) –


उड़ीसा में हर साल मनाई जाने वाली रथयात्रा के लिए ग्रैंड रोड पर सबसे पहले बलदेवजी का रथ निकलता है , फिर सुभद्रा जी का और अंत में जगन्नाथ जी का l गुंडीचा तक वह केवल बलगंडी पर ही अधिकृत रूप से ठहरता है , जहाँ पुजारी उन्हें नैवेध चढाते है l

श्री चैतन्य चरितामृत में श्रील प्रभुपाद जगन्नाथ यात्रा के गूढ़ रहस्य को उजागर करते है l व्रज गोपियों के संग को छोड़कर व्रजेंद्र नंदन श्री कृष्ण द्वारका में अपनी लीलाए करते है l जब एक सूर्यग्रहण के अवसर पर श्री कृष्ण कुरुक्षेत्र जाते है तो उनके साथ बलदेव , सुभद्रा तथा अन्य द्वारकावासी भी आते है l वहां श्री कृष्ण की भेट व्रजवासियो से होती है , और विशेष रूप से उनकी प्रिय गोपियों तथा गोपियों तथा श्रीमती राधारानी से l
परन्तु राधारानी और गोपिया श्रीकृष्ण के राजसी रूप एवं वैभव को देखकर प्रसन्न नहीं होती l वे तो श्री कृष्ण को व्रज के वनों में भ्रमण करते एक ग्वाले के रूप में देखना चाहती थी l आतुर हो गोपिय श्री कृष्ण , बलदेव और सुभद्रा को अपने हृदयों के रथ पर विराजित कर उन्हें वृन्दावन ले जाती है l

रथयात्रा और इस कथा में एक सम्बन्ध है l श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्री कृष्ण है , जिन्होंने अपने आपको सझ्मे के लिए श्री राधा के भाव को स्वीकार किया है l तथा जगन्नाथ पुरीमें जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ के समक्ष नृत्य करते थे तो वे श्री राधा के भाव में ही थे l उनके द्वारा भगवान् जगन्नाथ के रथ को खीचकर गुण्डिचा ले जाना , कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण के रथ को वृन्दावन ले जाने के भाव को इंगित करता है , क्यों की जगन्नाथ मंदिर की तुलना द्वारका से की जाती है और गुण्डिचा की वृन्दावन से l

रथ यात्रा के दौरान कई बार श्री चैतन्य महाप्रभु रथ के पीछे चले जाते थे l यह दर्शाता था की श्री कृष्ण ने व्रजवासियो की उपेक्षा की परन्तु वे कभी कृष्ण को भूले नहीं l इस रथयात्रा के माध्यम से वे वृन्दावन लौटते है l श्रीमती राधारानी के भाव में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान की परीक्षा लेते है की उन्हें अभी तक व्रजवासी याद है अथवा नहीं l जैसे ही महाप्रभु रथ के पीछे रह जाते तब रथ भी थम जाता तब भक्त रथ को चाहे जितना जोर लगा ले पर रथ टस से मस भी नहीं होता था l एसा इसलिए क्यों की राधारानी के मनोभाव को जानकर भगवान् जगन्नाथ श्रीमती राधारानी को यह दर्शाने के लिए ठहर जाते है की वे व्रजवासियो को भूले नहीं है l lजब फिर श्री चैतन्य महाप्रभु आगे आते तब जाकर रथ पुनः चल पड़ता था l जगन्नाथ के प्रति महाप्रभु के प्रेम तथा श्रीमती राधारानी के प्रति जगनाथ के प्रेम की इस प्रतिस्पर्धा में राधारानी रूपी महाप्रभु विजयी होते थे l जगन्नाथ मंदिर से गुण्डिचा मंदिर तक होने वाली रथयात्रा का यह भावार्थ श्रील प्रभुपाद श्री चैतन्य चरितामृत में वर्णन करते है l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ……………………………हरे कृष्णा l

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