Category - कृष्ण परम भगवन है

पहले कौन — भगवान कृष्ण या भगवान विश्नु

भगवान कृष्ण ही विष्णु के रूप में अवतरित होते है या भगवान विष्णु , कृष्ण रूप में अवतरित होते है ?

पृथ्वी पर सात द्वीप है , इसलिए पृथ्वी सप्तदीपा कहलाती है l यही भूलोक है l भू लोक से भुव: ,स्वः ,मह:, जनः , तपः और सत्यम — ये छह लोक ऊपर है और तल , अतल , वितल, सुतल ,तलातल ,पातल और रसातल ––ये सात लोक नीचे है l तो भू लोक के ऊपर छः लोक और भू लोक के नीचे सात लोक; इस प्रकार कुल मिलाकर १४ लोको के इस साम्राज्य के अधिपति ब्रम्हा जी है l यह चौदह लोको वाला ब्रम्ह्जी का अंड है इसलिए इसे ब्रम्हांड कहते हैl इस ब्रम्हांड के स्वामी सदा एक ही ब्रम्हा जी नही होते l वर्त्तमान ब्रम्हाजी के जीवन के जब १०० दिव्य वर्ष समाप्त हो जाते है तब दुसरे नए ब्रम्हाजी नियुक्त होते है l

दिव्य वर्ष क्या होता है ?

श्रीमद भागवतम में वर्णन मिलता है की जिसे हम पृथ्वी पर एक वर्ष कहते है वह देवताओ का एक दिन होता है l देवताओ के ऐसे ३६० दिनों का एक दिव्य वर्ष होता है l इसप्रकार के ४००० दिव्य वर्षी का सतयुग , ३००० दिव्य वर्षो का त्रेता युग , २००० दिव्य वर्षो का द्वापर युग और १००० दिव्य वर्षो का कलयुग होता है l एक युग बीत जाने के बाद तुरंत ही दूसरा युग शुरू नही होता बीच में संधि और संध्यांश काल भी होते है जो की युग काल के दुगुने होते है इस प्रकार सतयुग का ८००० दिव्य वर्सो का , त्रेता युग का ६००० दिव्य वर्षो का , द्वापर युग का ४००० दिव्य वर्षो का और कल युग का २००० दिव वर्षो का संधि संध्यांश काल होता है l इन चार युगों को एक चौकड़ी कहते है l

जब ऐसी ७१ चौकड़िया बीत जाती है तब एक मन्वंतर होता है l एक मन्वंतर के समाप्त होने के बाद पुराने इंद्र, मनु , प्रजापति , सप्तर्षि आदि बदल जाते है और फिर उनके स्थान पर नए नियुक्त किये जाते है l जब ऐसे १४ मन्वंतर बीत जाते है मतलब १४ इंद्र आदि देवता बदल जाते है तब ब्रम्हाजी का एक दिन होता है l

ब्रम्ह्जी के एक दिन को एक कल्प कहते है l तो दिन के समय ब्रम्हाजी सृजन करते है और फिर रात्रि में सबकुछ समेटकर सो जाते है l जैसे ही उनका अगला दिन (कल्प) शुरू होता है वे फिर से काम पर लग जाते है l इस प्रकार ब्रम्हाजी रोज व्यापार करते रहते है l

ब्रम्ह्जी के ३६० दिनों(कल्पो) का एक ब्रम्ह वर्ष होता है और ऐसे वर्षो से ब्रम्ह्जी की आयु १०० ब्रम्ह वर्ष की होती है l कल्प में तो केवल तीन ही लोको का नाश होता है किन्तु ब्रम्हाजी की आयु समाप्त होने पर १४ भुवन वाले समूर्ण ब्रम्हांड का ही नाश हो जाता है इसे महाप्रलय कहते है l

महाप्रलय के समय ब्रम्हा जी मुक्त पुरुषो के साथ परम भगवान महाविष्णु की श्वास से उनके शरीर के बीतर चले जाते है और जब महाविष्णु पुनः श्वास छोड़ते है तो पुन: प्रकट होकर सृजन करते है l इस प्रकार यह सृष्टि चक्र चलता रहता है l

यह हो हुआ एक ब्रम्हांड का हाल और ऐसे अनंत ब्रम्हांड महाविष्णु के एक बार श्वास छोड़ने से प्रकट होते और जब श्वास अन्दर खीचते है तो नष्ट हो जाते है l इस सारी प्रक्रिया में केवल एक स्थान है जो जैसे का तैसा अनश्वर और सनातन बना रहता है वह है भगवान कृष्ण का निज धाम गोलोक वृन्दावन l

श्रीमद भागवतम में कहाँ गया है की भगवान महाविष्णु और कृष्ण एक ही है l जैसे की मै अपने घर पर एक माँ हु, पत्नी हु किन्तु जब मै अपने कॉलेज में इंजीनियरिंग के बच्चो को पढ़ाती हु तब मै एक प्रोफ़ेसर कहलाती हु l ऐसे ही भगवान अपने निज धाम गोलोक वृन्दावन में गोपियों के प्रियतम ,यशोदा माई के लाला और नन्द नंदन — कृष्ण है पर सृष्टि के लिए जब वे कlरण सागर में योग निंद्रा में शयन करते है तो वे महाविष्णु कह्ललाते है l

कृष्ण सभी अवतारों के श्रोत है और उनका धाम नित्य और शाश्वत है l सत युग में वे ही विष्णु रूप में लीला करते है , त्रेता में वे ही प्रभु राम बनकर आते है और जब द्वापर युग आता है तब वे भूलोक पर अपने original कृष्ण रूप में अवतरित होकर धर्म की पुन: स्थापना करते है l

जब भगवान अवतार लेते है तब वे अपने शाश्वत धाम में भी वैसे के वैसे ही बने रहते है l एसा नही है की अब अगर भगवान भूलोक पर आ गए है तो वे गोलोक वृन्दावन में अनुपस्थित होंगे l भगवान की शक्ति अचिन्त्य है इसलिए हमें अत्यधिक तर्क पूर्ण व्याख्या से बचना चाहिए और भगवान कृष्ण को परम सत्ता स्वीकार करना चाहिए l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ………………… हरे कृष्ण l

कृष्ण सर्वत्र साक्षी है

एक बार की बात है उद्धव भगवान कृष्ण से पूछते है – हे कृष्ण मै आपको समझ पाने में असमर्थ हु इसलिए आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हु ?

कृष्ण ने कहाँ संकोच न करो मित्र पूछो जब अनुमति मिल गई तो उद्धव बोले- हे कृष्ण !मुझे बताइए की सच्चा मित्र कौन है ?

कृष्ण बोले – सच्चा मित्र वह है जो न बुलाये जाने पर भी अपने मित्र की सहायता के लिए खुद आता है l

उद्धव – कृष्ण तुम पांडवो के सच्चे मित्र हो पर जब उन पर विपत्ति आई तब तो तुमने उनकी सहायता नहीं की l तुमने उन्हें जुआ खेलने से रोका क्यों नहीं ? चलो नहीं रोका तो नहीं रोका पर तुम चाहते तो भाग्य को उनके अनुकूल कर सकते थे ताकि उनकी विजय हो l किन्तु तुमने एसा भी नही किया l क्यों? और तब जब दुर्योधन ने कहाँ की वह जुए में हारी हर चीज़ लौटा देगा यदि वह द्रौपदी को दाव पर लगाकर दाव जीत जाता है; तब भी तुमे धर्मराज को और आगे खेलने से नहीं रोका क्यों ? उसके बाद द्रौपदी को भरी सभा में बाल पकड़कर घसीटा गया पर तुममें कुछ नहीं किया क्या वे तुम्हारे मित्र नहीं थे ? जब अपमानित द्रौपदी लगभग नग्न होने ही वाली थी तब तुमने उसे वस्त्र दिए तो क्या यह उसकी लाज बचाना था?

केवल तुम जब लोगो की विपत्ति में रक्षा करोगे तो ही “आपधबान्ध्व “ कहला सकते हो किन्तु तुमने तो उनकी मदद नहीं की तो तुम्हे क्यों इस नाम से पुकार जाना चाहिए ? हे केशव क्या यह धर्म है ? और इस प्रकार पूछते हुए उद्धव के नेत्रों से अश्रु धरा बहने लगी l

भगवान कृष्ण बोले – हे उद्धव ! इस दुनिया का नियम है—“ जो विवेक शील है व्ही विजयी होता है “
शुरू में जुए के खेल में धर्मराज जीत रहे थे क्यों की दुर्योधन दाव खेलना नहीं जनता था इस लिए उसेने अपना विवेक इस्तेमाल किया और अपने मामा शकुनी को खेल में शामिल करवाया l शकुनी जुआ खेलना जनता था इसलिए अब दुर्योधन जीत रहा था l धर्मराज को भी ऐसे ही मुझे खेल में शामिल करवाना था पर उसने एसा नहीं किया क्यों की पांडव मुझसे छुपकर खेल खेलना चाहते थे l उन्होंने मुझे शामिल नहीं किया l तुन्हें क्या लगता है की यदि मै धर्मराज की तरफ से खेलता तो कौन जीतता ? यदि मै धर्मराज की इस भूल को भूल भी जाऊ तो उसने एक और मुर्खता यह की कि मुझसे प्रार्थना की – “ हे कृष्ण ! तुम अन्दर मत आना “ इसप्रकार उसने अपने दुर्भाग्य को स्वयं न्योता दिया l उसने मुझे अपनी प्रार्थना द्वारा बाँध रखा था ; मै तो वही बहार प्रतीक्षा कर रहा था की कोई तो मुझे याद करेगा पर किसी ने मुझे याद नही किया l द्रौपदी ने भी पहले मुझे याद नहीं किया वह अपने बल पर अपनी रक्षा करती रही , परिजनों को रक्षा के लिए बुलाती रही और जब कोई नहीं आया तब उसे मेरी याद आई तब जाकर मैंने उसकी रक्षा की l तुम ही बताओ इस सब में मेरी क्या गलती है ?

उद्धव बोले – वाह ! बढ़िया तर्क है कान्हा मै तो impress हो गया पर मै अभी निःशब्द नहीं हुआ हु ; क्या मै एक और प्रश्न पूछ सकता हु ? कृष्ण ने अनुमति दे दी l

तब उद्धव बोले – तो इसका मतलब है की तुम केवल तब आओगे जब तुम्हे बुलाया जायेगा ? क्या तुम खुद अपने आप धर्म की रक्षा के लिए नहीं आओगे ?

कृष्ण मुस्कुराते हुए बोले – हे उद्धव ! हर किसी का जीवन उनके कर्मो के आधार पर निर्धारित होता हैl मै इस कर्म के सिद्धांत को न तो लागु करता हु न ही इसमें कोई हस्तक्षेप ही करता हु l मै तुन्हारे अन्दर साक्षी की तरह सदैव विद्यमान रहता और जो कुछ भी तुम करते हो सब कुछ देखता रहता हु l परमात्मा रूप में यही मेरा धर्म है l

बहुत अच्छे तो तुम हमेशा हमरे पास ही हो और सब कुछ नोट करते रहते हो , हमारे सरे कुकर्मो को देखते रहते हो और इस तरह हमें न रोक कर तुम यह चाहते हो की हम और भी पाप करते रहे और जन्म – जन्मान्तर तक भुगतते रहे ? उद्धव बोले l

कृष्ण बोले – हे उद्धव ! तुम मेरे वाक्यों को गहराई से समझने की कोशिश करो l यदि तुम यह समझ जाओ की मै सदैव तुम्हारे भीतर हु तो फिर तुम कोई भी बुरा काम कर ही कैसे सकते हो ? किन्तु जब तुम इन्द्रिय सुख में डूबकर मुझे भूल जाते हो और फिर अधिकाधिक सुख पाने की आस में मुझे पूरी तरह भूल जाते हो तब एक के बाद एक पाप कर्म करते रहते हो l इस प्रकार मै तुम्हे कभी नहीं छोड़ता पर तुम मुझे छोड़कर कर पाप में लग जाते हो और कर्म के सिद्धांत के अनुसार दण्डित किये जाते हो l यह धर्मराज की भूल थी की वे यह सोच रहे थे की वे मेरी जानकारी के बिना भी जुआ खेल सकते है l यदि वे यह अनुभव कर लेते की मै सदा सर्वत्र साक्षी रूप से विद्यमान हु तो क्या जुए का खेल कुछ अलग ही तरह से समाप्त न हुआ होता ?

उद्दव बिलकुल चुप हो गए और भक्तिभाव से बोले – “ हे केशव ! कितनी गहन बात कही है तुमने ! वस्तुतः यही परम सत्य है l “

यदि हम यह समझ जाए की कुछ भी कृष्ण के बगैर हिल तक नही सकता तो फिर हम कैसे उन्हें साक्षी रूप में हर जगह नहीं पाएंगे ? और तब उन्हें भूलकर कुछ भी पाप कर्म कर ही कैसे सकते है ? सारे पापाचार और उनसे उत्पन्न होने वाली समस्याओ का मूल है “कृष्ण से विमुखता“l

पूरी भगवद गीता में कृष्ण ने यही बात अर्जुन को जगह-जगह समझाने की कोशिश की है l वे अर्जुन के सारथि और सलाहकार थे पर फिर भी अर्जुन के युध्ह में खुद नही लड़ाई नहीं की , तो हुए ना साक्षी l हमें यह महसूस करना चाहिए की हम कभी भी अकेले नहीं है और कृष्ण से बचकर कुछ भी नही कर सकते l कृष्ण साक्षी रूप में हमारा इंतज़ार कर रहे है कब हम उन्हें अपनी हर क्रिया में शामिल मानते हुए अपनी चेतना को “कृष्ण चेतना” में परिवर्तित करके सदैव उनका ध्यान कर पायेंगे l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………………………. हरे कृष्णा