Category - श्रीमद भागवतम

चतुश्लोकी भागवत

भगवान परम सत्य है l परम सत्य का अर्थ है जो कभी भी नष्ट नहीं होता, जो परमानेंट है l श्रीमद भागवतम में ४ श्लोक दिए गए है जिन्हें चतुश्लोकी भागवतम कहते है जिनमे सम्पूर्ण ज्ञान का रहस्य वर्णित है l

देवर्षि नारद अपने पिता सृजनकर्ता ब्रम्हाजी से प्रश्न करते है – हे ब्रह् देव ! अlपने इस पूरी सृष्टि का सृजन किया है पर आप अनासक्त बने रहते है l तो अपने यह कैसे किया ?

ब्रम्हाजी बोले – हे नारद ! जब स्वयं भगवान महाविष्णु ने मुझे सृष्टि करने की आज्ञा दी तब यही प्रश्न मैंने भी उनसे किया था l तब उन्होंने मुझे ४ श्लोको द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान दिया था l इन श्लोको को चतुश्लोकी भगवत कहते है l इस श्लोको के ज्ञान ने मुझे बिना अlसक्त हुए सृष्टि करने में सहायता की l इन श्लोको में परम भगवान महाविष्णु(कृष्ण) द्वारा कहा गया ज्ञान है l

पहले श्लोक में कृष्ण कहते है की कही भी मेरे से पहले कुछ भी नही था और मेरे बाद भी कुछ शेष नहीं बचता l और इस प्रकार उन्होंने घोषणा की उनके बगैर कही भी कुछ भी संभव ही नहीं है l यह वेदों में कहे गए प्रथम महावाक्य के जैसे है जिसमे की वर्णन है की सर्वत्र परमात्मा का वास है l

तो इसे बढ़ने के बाद एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है की यदि महाविष्णु(कृष्ण) परम सत्य है तो यह जिसे हम प्रकृति कहते है सृष्टि कहते है वह क्या है ?

तो इसके उत्तर में भगवान कहते है मेरे आलावा जो कुछ भी तुम्हे विद्यमान प्रतीति होता है वह मेरी ही शक्ति माया द्वारा रचा गया मोह है l जैसे की अँधेरे में रस्सी को सांप समझने का भ्रम होता है वैसे ही जो कुछ भी मेरे आलावा या मुझसे अलग प्रतीत होता है वह सब कुछ और नहीं बल्कि स्वयं मै हु l जब हम नींद में होते है तो हम स्वप्न देखते है ; स्वप्न में कई तरह के लोग , चीज़े और स्थान देखते है जो की हमें बिलकुल real लगती है किन्तु जब हम नींद से जागते है तो सब कुछ ख़तम हो जाता है इसीलिए हम इसे real नहीं है कहते हैl जैसे हम स्वप्न देखते है वैसे ही विष्णुमाया मोह रूपी संसार का निर्माण करती है जिसे की प्रकृति/सृष्टि कहते है l

तीसरा शोल्क बहुत ही गूढ़ है l इसमें कृष्ण कहते है की मै इस दुनिया में सर्वत्र हु किन्तु तो भी मै उनमे नहीं हु l यह पढने में बहुत विरोधाभासी प्रतित होता है- कोई कैसे सब कुछ है तो भी सबमे नहीं है l जैसे अँधेरे में रस्सी है जो की सांप जैसी दिख रही है इस प्रकार रस्सी की वजह से सांप होने का भ्रम हो रहा है अर्थात रस्सी की वजह से साँप है एसा दिख रहा है किन्तु सचमुच में कोई साँप नहीं है इसलिए रस्सी के सांप होने का कोई प्रश्न की नहीं होता l

अंतिम ४था श्लोक हमें परम सत्य की अनुभुती करlता है l परम सत्य को जानने के लिए पहले हमें यह जाना होगा की क्या परम सत्य नहीं है l चूँकि परम सत्य हमारी इन्द्रिय समझ के परे है है इस लिए उन्हें समझने के लिए वो क्या क्या नही है समझना ज्यादा आसान है इसलिए इस प्रकार वर्णन किया गया है l इसलिए वेदों में परम सत्य का वर्णन नेति नेति (परम सत्य यह नहीं है , परम सत्य वह नहीं है ….) कहकर किया गया है l जब आप जान जाते है की रस्सी सांप नहीं है l इसलिए जब हम यह समझ जाते है की रस्सी सांप नहीं है तब हम आसानी से कह सकते है की यह रस्सी है l इसी प्रकार परम सत्य भौतिक प्रकृति नहीं है अर्थात भौतिक प्रकृति तो है ही नहीं जो कुछ भी है परम सत्य(भगवान) ही है l वासुदेवः सर्वम इति l

हे नारद इस प्रकार जब इन चार श्लोको को जब मैंने श्री भगवान कृष्ण के मुख से सूना तो मेरा कर्तुत्व का भाव मिट गया और मुझे पूर्ण ज्ञान की अनुभूति हुई इस प्रकार मैंने खुद को सृजन के कार्य में अनासक्त होकर लगाया और अपनी duty निभाई l

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………….. हरे कृष्ण l