शोक क्यों करे ?

 
भगवद गीता में परब्रम्ह श्री कृष्ण ने अर्जुन का शोक समाप्त करने के लिए उसे शरीर और आत्मा के विषय में बताया की आत्मा अविनाशी है इसे जलाया , सुखाया या हथियारों के द्वारा काँटा नहीं जा सकता l अतः आत्मा का नाश संभव नहीं है l आत्मा न तो उत्पन्न होती है न ही नष्ट होती है इसीप्रकार की परिभाषा अlपने physics में उर्जा की पढ़ी होगी “उर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है न नष्ट की जा सकती है वह केवल एक रूप से दुरसे रूप में रूपांतरित की जा सकती l” तो आत्मा अविनाशी है l
 
भगवान् से यह सब सुनकर भी जब अर्जुन चुप ही रहे तो भगवान ने अर्जुन से कहाँ – “ हे महाबाहो ! अगर तुम इस आत्मा को नित्य पैदा होने वाला और नित्य मरने वाला भी मान लो (हालाँकि की एसा है नहीं तो भी मान लो ) तो भी तुम्हे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए l”
 
भगवान् एसा इसलिए कह रहे है क्यों की जो जन्मने वाला है उसका मरण भी निश्चित है और जो मर गया है वह पुनः जन्म भी अवश्य लेगा – यह नियम कोई टाल नहीं सकता l अगर बीज को पृथ्वी में बो दिया जाये , तो वह फूलकर अंकुरित हो जाता है और फिर वह क्रमश: बढ़ता हुआ वृक्ष बन जाता है l तो इस प्रकार वह एक क्षण के लिए भी एक जैसा (या वैसे का वैसा) नहीं रहता निरंतर अपना रूप बदलता रहता है l दुनिया की कोई भी चीज़ जो आप इस क्षण देख रहे है अगले क्षण में वैसी की वैसी नहीं रहेगी उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन समय के साथ अवश्य होगा चाहे आप नोट कर पाए या न कर पाए ; हर पल हर चीज़ अपना रूप बदल रही है l समय में एक क्षण के लिए भी पीछे जाकर हम उस चीज़ को वैसा नहीं देख सकते जैसी वह पहले थी l
 
वस्तुतः जिसे हम रूप बदलना कह रहे है यह तभी संभव है जब कोई वास्तु अपने पुराने रूप को समाप्त करके नए रूप को धारण करे मतलब प्रत्येक जीव अपने एक ही जीवन काल में भी प्रतिदिन बार बार जन्म ले रहा है और बार बार मर रहा है l जिंदगी के जितने साल हमने जी लिए उतने साल जिंदगी के कम हो गए तो यह प्रतिदिन जन्मना और मरना ही तो है l वैज्ञानिक कह्ते है की हमारे शरीर में रक्त और कोशिकाओ का समूह बार बार मरता है और फिर नया पैदा होता है ऐसा हर दिन हो रहा है l इस प्रकार देखा जाये तो हम प्रतिक्षण मर रहे है पर हम शोक नहीं करते क्यों ? क्यों की हम जानते है की हम यह सब रोक नहीं सकते l
 
संसार और शरीर नित्य परिवर्तनशील है यदि परिवर्तन न हो तो मनुष्य बालक से जवान कैसे बनेगा ? रोगी निरोग कैसे होगा ? बीज का वृक्ष कैसे बनेगा ? परिवर्तन के बिना संसार एक स्थिर चित्र बनकर रह जायेगा l वास्तव में मरने वाला ही मरता है तो शोक क्यों करे ? (शरीर मरने वाला है मरेगा ही)
 
रामायण में बलि के मरने के बाद जब तारा शोक करती है जो कुछ प्रभु श्री राम तारा से कहते है उसका सार इस प्रकार है – “तारा का शोक देख कर रघुराय ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया ले ली l प्रभु बोले क्षिति , जल , पावक , गगन , समीरा पांच तत्वों से यह अधम शरीर बना है l जो की बस कुछ काल के लिए प्रकट होता है फिर मर जाता है किन्तु आत्मा नित्य है l तुम क्यों रोती हो ? जब तारा में ज्ञान उपजा तो वह प्रभु के चरणों पर गिर पड़ी और प्रभु चरणों की परम भक्ति मिले एसी विनती की l”
 
तो हमें भी तारा से जीवन के वास्तविक लक्ष्य के बारे में शिक्षा लेनी चाहिए l अपने परिजनों की मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए और जीवित शरीर को श्री भगवान् के चरणों की सेवा में लगाना चाहिए l
 
जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद जय ………………………………. हरे कृष्णा l

तितिक्षा (सुख दुःख आदि सहन करने की शक्ति) क्या है ?

अपने जीवन में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने के लिए विवेक से काम ले l जैसे यदि पाँव में कांटा चुभ जाये तो उसे निकलने के लिए नुकीली सुई से खुरोदकर निकlलना पड़ता है तब जाकर कांटा बाहर आता है तो कांटा निकालते तक हमने दर्द सह लिया; क्यों ? क्योंकि हम जानते है की यदि कांटा नहीं निकला तो दर्द और भी अधिक बढ़ जायेगा l इसीप्रकार कडवी दावा के बुरे स्वाद को भी हम सह लेते है क्यों की हम जानते है की ऐसा करने से ही हमें बिमारी से छुटकारा मिलेगा l तो इसका मतलब यह है की यदि बड़े दुःख से छुटकारा मिल रहा हो तो हम छोटे दुःख को सह लेते है l
 
सुख और दुःख भौतिक चीजों , व्यक्तियों और परिस्थितियों की प्राप्ति / अप्राप्ति पर आधारित नहीं है l जैसे जल ठण्ड के दिनों में अच्छा नहीं लगता किन्तु गर्मी के दिनों में वही जल बहुत अच्छा लगता है l जल तो वही है पर वह कभी अच्छा लग रहा है और कभी बुरा लग रहा है तो इससे यह पता लगता है की सुख और दुःख प्राकृतिक पदार्थो में नहीं है वह हमारे अन्दर है
 
जब हमें परिस्थतिया अनुकूल प्रतीति होती है तो सुख होता है और जब परिस्थितिया प्रतिकूल प्रतीति होती है तो दुःख होता है l विभिन्न पदार्थो , परिथितियो और व्यक्तियों की प्राप्ति / अप्राप्ति तो हमारे हाथ की बात नहीं है किन्तु इन परिथितियो के आने पर सुखी या दुखी होना और उन्हें सहना या न सहना हमारे हाथ की बात है l (प्रतिक्रिया हमारे हाथ की बात हैl )
 
वस्तुतः “ यह अनुकूल है “ या “ यह प्रतिकूल है “ एसा अनुभव होना दोषी नहीं है बल्कि उसको लेकर अंतःकरण में राग-द्वेष , हर्ष – शोक आदि विकारो का उत्पन्न होना दोषपूर्ण है और जो इन परिस्थितियों में राग – द्वेष , हर्ष – शोक , उत्पन्न नहीं होने देता इनको सह लेता है वह सहनशील है l
 
सुखी दुखी होना सुख –दुःख का भोग कहलाता है l यदि हम सुख दुःख का भोग करते रहेंगे तो भविष्य में हमें भोग – योनियों में जन्म लेना पड़ेगा(जानवर, पक्षी , कीट ,पतंग आदि ) l किन्तु यदि सुख दुःख से प्रभावित न हो तो भगवद गीता के दुसरे अध्यया में कृष्ण कहते है की ऐसा भक्त पूर्ण रूप से मुक्त है और अमरत्व का अधिकारी है अर्थात अमरत्व प्राप्त करता है l
 
सोचिये अमरत्व की प्राप्ति के लिए ही तो देवताओ और दानवो ने साथ मिलकर समुद्र मंथन किया थाl पर हमें तो कोई समुद्र मंथन भी नहीं करना पड़ेगा बस सुख-दुखो को सहने के लिए विवेक का इस्तेमाल करना होगा l और इन्हें सहने के बदले में कृष्ण अमरत्व देने वाले है तो मेरी समझ में सौदा बुरा नहीं है l हे हे हे …. खैर
 
तो अब तक ये तो हुई बात दुःख को सहन करने की पर सुख को तो सहने की जरुरत नहीं है सुख में तो मजा है l तो फिर भगवान सुख को भी सहन करो एसा क्यों बोले ? सुख को सहने का क्या मतलब है ? सुख का भोग न करना ; सुख आने पर अत्यधिक खुश न होना और सुख बना रहे एसी चेष्टा न करना l क्यों की जिन जिन चीजों से सुख का भोग(अनुभव ) होता है तो उन उन चीजों के प्रति राग होता है और जब वे चीज़े नहीं मिलाती तो दुःख होता है l तो दुःख की उत्पत्ति होती है सुख भोग से l इसलिए सुख आने पर अत्यधिक खुश न हो और सुख बना रहे एसी चेष्टा ना करे और अच्छी परिस्थितियों का सदुपयोग भक्तिमयी सेवा करने के लिए करे l
 
तो जन्म मृत्यु के इस चक्र से मुक्त होने के लिए सुख-दुःख से अपने भीतर विकार (राग- द्वेष …) उत्पन्न मत होने दिजिये l कृष्ण की , वैष्णव जानो की और भक्तो की भक्तिमयी सेवा करिए, सेवारत रहने से आप भौतिक जीवन के सुख दुखो से प्रभावित नहीं होंगे और परिस्थितयो को सहन करना सुगम बन जायेगा l
 
जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय …………………….. हरे कृष्णा l

हमारे दुःख कैसे समाप्त होंगे?

भगवद गीता में भौतिक दुखो का नाश करने वाला योग भी बताया गया है। अध्याय ६ श्लोक संख्या १७ में भगवान् कहते है- “वह जो भोजन, नींद, मनोरंजन और काम की अपनी आदतों में संतुलित है वह योग प्रणाली का अभ्यास करके सभी भौतिक दुखो को कम कर सकता है।”

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्य सनातन गोस्वामी को एक विशेष स्थिति के अनुसार उचित त्याग(युक्त वैराग्य ) के बारे में उपदेश दिया उन्होंने सभी मामलों में कठोर त्याग और मनोयोग के लिए मना किया। जो कठोर त्यागी(ज्ञान योगी/ निर्विशेषवादी) होते है वे कहते है की यह भौतिक जगत मिथ्या है और इस प्रकार वे सभी वस्तुओ का त्याग करके हिमालय पर साधना में लींन रहते है। वे भौतिक जगत में जनकल्याण के किसी भी काम से स्वयं को वंचित रखते हुए केवल ब्रम्ह की प्राप्ति के लिए योग साधना करते है, किन्तु इस प्रकार के त्याग के लिए सवंय भगवान् उपर्युक्त श्लोक में मना कर रहे है। इस प्रकार के वैरायगा को शुष्क वैराग्य(कठोर त्याग) कहा जाता है।

चैतन्य महाप्रभु शिक्षा देते है की प्रत्येक व्यक्ति को विशेष स्थिति (देश, काल और व्यक्तियों )के अनुसार संतुलित व्यवहार करना चाहिए। हमें नियमनग्राह के सिद्धांत से बचना चाहिए- यानी, कोई असंभव काम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। संभवतः जो नियम एक देश में संभव है दूसरे देश में संभव न हो। इसलिए शुष्क वैराग्य के अनुशीलन के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु मना कर रहे है और पूज्य पाद श्रील प्रभुपाद ने भी शुष्क वैरायगा की निंदा की है। पूज्य पाद भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर गोस्वामी महाराज कहते है-‘भक्तिपूर्ण सेवा का सार ध्यान में रखा जाना चाहिए, न कि बाह्य सामग्री।” इस प्रकार हमारे सभी वैष्णव आचार्यो ने शुष्क वैराग्य के पालन के लिए मना किया है।

साथ ही साथ व्यक्ति को मनोयोगी भी नहीं होना चाहिए; जैसे में आप से कहु -सुबह सबेरे स्नान करके तुलसी जी को प्रेम और श्रद्धा से एक लोटा जल अवश्य चढ़ाये ; तो आप मुझसे कहे-आप तुलसी के एक पौधे को जल देने की बात करते है! मै तो प्रतिदिन मेरे बगीचे के न जाने कितने पौधो को जल देता हु।इसे कहते है -मनोयोग, जिसका आधार है हमारा मन, जो हमारे मन को भये वो ही हमारे हिसाब से योग है। आपने हमेश देखा होगा जब भी मै आपको कोई भी सलाह देती हु तो उसके पहले मै शास्त्रों से प्रमाण के तौर पर कोई न कोई श्लोक उठाती हु । मै मनघडंत कुछ भी नहीं कहती। तो हमें भी मनघडंत नयी योग प्रणाली बनाने की कोशिस नहीं करना चाहिए। हमें शास्त्रों के मत के आधार पर तथ्यों पर विचार करने के उपरांत ही उनका अनुसरण करना चाहिए।तो हमें मनोयोग से बचाना चाहिए -यह एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

इसप्रकार हमें न तो शुष्क वैराग्य का दिखावा करना चाहिए ना ही मनोयोग का निर्माण करना चाहिए बल्कि शास्त्रों के प्रमाणित साधनो को ही स्वीकार करना चाहिए।

हमारे वैष्णव ग्रंथो में सर्वमान्य ग्रन्थ है- चैतन्य चरितामृत। इसके मध्य लीला के अध्याय २३ श्लोक संख्या १०५ में महाप्रभु कहते है-

युक्ता-वैराग्या-शैली साबु सिखा
शुक्का-वैराग्या-ज्ञान सबा निआधिला

अर्थात स्थिति के अनुसार उचित त्याग करे और सभी मामलों में शुष्क त्याग और मनोयोग से बचना चाहिए।

तो युक्त वैराग्य जैसा की भगवद गीता अध्याय ६ श्लोक संख्या १७ में बताया गया है के अनुसार युक्त वैराग्य को जीवन में लागु करके हम भौतिक दुखो को कम कर सकते है। श्रील रूप गोस्वामी द्वारा कृत भक्ति रसामृत सिंधु के भाग १ अध्याय २ श्लोक संख्या २५५ -२५६ में कहा गया है की “यदि किसी की किसी भी विषय में कोई भी आसक्ति नहीं है फिर भी भगवान् कृष्ण की भक्ति से सम्बंधित सभी वस्तुओ को वह स्वीकार करता हुआ भी सभी प्रकार के आधिपत्य के भाव मुक्त होता है अर्थात त्यागी होता है ; जबकि वह जो कृष्ण के साथ चीज़ो के संबंध के ज्ञान के बिना सबको खारिज करता है वह अपने संन्यास में पूर्ण नहीं है।”

तो हमें केवल भक्ति के लिए अवांछित(प्रतिकूल) बस्तुओ का ही त्याग करना है भक्ति के लिए वंचित (अनुकूल) वस्तुओ को ग्रहण करना है और ग्रहण की जाने वाली वस्तुओ पर भी अपना आधिपत्य ना मानते हुए वैरायगा का पालन करना है; ऐसा करने से हम सभी प्रकार के भौतिक दुखो से मुक्त हो जायेंगे।

जैसे फेस बुक को लोग अपनी पिक्स पोस्ट करने के लिए इस्तेमाल करते है और अपने मित्रो के लाइक्स और कमैंट्स की उम्मीद रखते है इस प्रकार हम इस फेसबुक को अपनी प्रशंसा पाने की अभिलाषा की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करे तो यह भोग बुद्धि कहलाती है इसी के स्थान पर यदि भक्त  भगवान की भक्ति के प्रचार के लिए यदि इसका उपयोग करे तो यह योग बुद्धि है। भोग क्षणिक है योग स्थायी है; भोग असंतुष्टि और दुखो का श्रोत है योग भगवद प्रेम और प्रेरणा का श्रोत है। यह जगत मिथ्या नहीं है हमें इसका त्याग नहीं करना है; बल्कि हमें अपनी भोग बुद्धि का त्याग करना, सभी पापाचार का मूल भोगबुद्धि है।यदि भगवान की सेवा का लक्ष्य हो जाये तो लैपटॉप, मोबाइल,कार, सर्वसुधिया युक्त घर हमरी योग्ताएं सब कुछ हम इस्तेमाल तो करेंगे पर अपने भोग के लिए नहीं बल्कि कृष्ण की प्रसन्नता और सेवा के लिए करेंगे और इसप्रकार वस्तुओ का त्याग वैराग्य नहीं है वस्तुतः उनमे भोग बुद्धि का त्याग ही वास्तविक वैयाग्य है जो परम शान्ति की अनुभूति कराने वाला है।

जगद गुरु  प्रभुपाद की जय         ………………………… हरे कृष्णा l 

कृष्ण नाम और बालक

एक बार की बात है। एक दिन एक बालक को खीर खाने की इच्छा हुई। तभी वहा से एक  दुध वाली गुजर रही थी। तो बालक से बोली- क्या तुम्हे  भी दुध चहिये?

बालक बोला- हाँ  पर मेरे पास मूल्य चुकाने के लिये पैसे नही है, वो बोली जा भीतर  से एक बर्तन ले आ आज मै तुझे मुफ्त मे दुध दूंगी l

बालक तीव्रता से एक  पतीलि ले आया, दुध वाली ने उसे  दुध दे दिया और बोली पी जा  जल्दि से, बालक ने एक  हि सास मे सारा दुध पी लिया और धन्यवाद दिया; अगले दिन सुबह से हि वो दूधवाली का रास्ता ताकने लगा ; बहुत देर बाद वो आई, और फिर से दुध दे गई; बालक बहुत प्रसन्न हो गया. एैसा कुछ दिन और चला फिर एक  दिन वो नही आई।

बालक इन्तजार करता राहा पर वो नहि आई। बलाक उदास हो गया और रात भर उसी के बरे मे सोचता रहा  फिर  अगले दिन वो आई।

बालक ने पुछा- तुम कल क्यो नहि आई, मै सारा दिन इन्तजार करता रहा। उसने बाताया कि उसकि तबियत खाराब थी; फिर बोली जा जल्दि से बर्तन ले आ और दुध पी ले। उसने कहा मेरl  खीर खाने का मन करता है; क्या तुम मुझे कुछ ज्यादा दुध दे सकती हो?

दुध वाली बोली ठीक  है जाओ कोइ बड़ा बर्तन ले आओ; और बड़े बर्तन को दुध से भर दिया बालक खुश हो गया, उसने पुछा तुम्हारा नाम क्या है? देखो न जब तुम कल नहीं  आई तो मै किसी  से पुछ भी नही पा रहा था कि तुम क्यो नही आई ; सब कहते  कौनसी  दुध वाली? और मै नाम न बता पl  रहा था!

वो बोली मेर नाम है कृष्णा केशरवानी , मै पास के गॉव मे रह्ती हु, मै यहाँ  नई आइ हु इस लिये बहुत कम लोग मुझे  जानते है; उसके बाद वो चली गई।

अब बालक खीर बनाने का सामान जुटाने मे लग गया। वो इक अनाथ बलाक था उसके माता-पिता के देहान्त के बाद अब वो अकेला ही अपने घर मे रहता  था; उसने सोच अगर दुध को एैसे हि छोड़ के चीनी और चावल लेने गया तो कुत्ता बिल्लि इसे चट कर जायेन्गे इसलिए  इसे धिमि आंच  पर गैस पर रख देता हु जब तक वापिस आउन्गा तब तक दुध भी गरम हो जायेगा फिर तब  चीनी और चावल भी मिला दूंगा । 

तो वह दुध गैस पर रख कर दुकान को गया ;  दुकान पर  भारी भीड़ थी जब समान लेकर लौटा तो देखा सारा दुध पतिलि कि तलि मे चिपक गयl  है और जल भुनकर खाक हो चुका है; अब क्या आज तो खीर के चक्कर मे दुध भी गवा दिया।

जैसे तैसे दिन कटा और फिर अगले दिन दुध वाली का इन्तजार शुरु हुआ जब वो नही आई तो पास पड़ौस मे पुछ्ताछ की- चाचा आपने उस दुध वाली को देखा क्या? चाचा बोले – कौनसी दुध वाली? नाम क्या है उसका? बलाक बोला- वो कृष्णा के के …. !!! वो क्रिश्न आप जानते है न उसे? चाचा- नही मै किसी क्रिश्न नाम कि दुध वाली को नही जानता. बलाक ने दुसरे आदमी से पुछा सब केहेते पुरा नाम क्या है? पर वो बता ना पाता, आखिरकार एक मिला जो शायद उसे जनता था तो उसने  कहा- हाँ  दो दिन बाद आयेगी बाहर गॉव गई है…….

अब बालक ने सोचा मै उसका पुरा नाम तो भुल हि गया हु,अब जो कुछ  याद है कहि उतना भी ना भुल जाउ; तो वो बार बार उसका नाम याद करने लगा- कृष्णा कृष्णा कृष्णा कृष्णा ….. कृष्णा कृष्णा दिन-रात सोते-जगते बस कृष्णा कृष्णा कृष्णा.. कहता  जाता नाम का  ऐसा  प्रभाव हुआ की अब तो कृष्णा बोले बगेर उसे चैन ही ना आये ना भुख लगे न प्यास बस कृष्णा कृष्णा कृष्णा कहता जाये l

कुच दिनो बाद दुध वाली आई, बोली बेटा दुध ले ले, बालक बस कृष्णा कृष्णा कहता  जाये, उसने पुछा क्या हुआ है तुमको ? क्या खीर नही बनानी? बलाक – नही अब खीर नही बनानी, तेरे नाम मे कुछ जादु है अम्मा; कृष्णा कृष्णा… . जपने से बड़ा अनन्द और शान्ति मिल रही है कृष्णा कृष्णा… थिक है खीर नहि खानी तो दुध हि पी ले. बालक- हाँ  थोड़ा सा उस गिलास मे रख दो जब भुख लगेगि तो पी लूँगा  अब तुम जाओ मुझे जप करना है, मुझे उस कृष्णा को ढुढना है जाने कहाँ  छुपा हुआ है. … कृष्णा कृष्णा कृष्णा …..

भगवान के नाम की ये गाथा जाने कितनि सच है पर कथा का सार सत् प्रतिशत सत्य है. और यहि वेदो और पुरानो का भी सार है. जब अप्रत्यक्ष रूप से  “नारlयन नारlयन नारlयन …” जपने से अजामिल कि सदगति हुइ तो फिर इस कथा मे बलाक पर हुये हरि नाम जाप के प्रभाव पर सन्शय क्यो करे?

श्रीमद भगवतम के बलाक ध्रुव कि कथा और इस बलाक कि कथा मे काफी समानाता है हरि नाम कि गाथॉ जितनी गई जाये उतनी कम है l इसलिए  हरे कृष्ण हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम , राम राम हरे हरे || का जप करके देखिये और मेह्सुस किजिये और फिर भक्तो की   तरह हरि नाम के गुणगान  मे लग जाइये .

जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद की जय ……………………………………………………… हरे कृष्ण l